शौच के समय दर्द, जलन और रक्तस्राव क्या यह बवासीर (Hemorrhoids) का संकेत हो सकता है?

शौच के समय दर्द होना, जलन महसूस होना या टॉयलेट पेपर पर खून दिखना ये लक्षण अक्सर लोग नज़रअंदाज़ कर देते हैं। कई बार शर्म या डर के कारण लोग डॉक्टर से बात नहीं करते, जबकि यह समस्या शरीर की एक आम लेकिन गंभीर चेतावनी हो सकती है। ऐसे लक्षणों के पीछे सबसे आम कारणों में बवासीर शामिल है। इस आर्टिकल में हम समस्या के बारे में विस्तार से जानेंगे।

बवासीर क्या होती है?

बवासीर एक ऐसी स्थिति है जिसमें गुदा और मलाशय के आसपास की नसें सूज जाती हैं। जब इन नसों पर ज़्यादा दबाव पड़ता है तो वे फूल जाती हैं और दर्द, जलन या रक्तस्राव का कारण बनती हैं।
यह समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है, लेकिन आज की जीवनशैली के कारण युवा वर्ग में भी तेजी से बढ़ रही है।

बवासीर क्यों होती है?

बवासीर अचानक नहीं होती, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। कब्ज़ की स्थिति में ज्यादा ज़्यादा ज़ोर लगाने से नसों पर दबाव बढ़ता है। इससे यह समस्या उत्पन्न हो सकता है। फाइबर की कमी से मल सख्त हो जाता है। जिससे भी यह समस्या हो सकती है। इनके अलावा भी निम्नलिखित कारण प्रभावित करते हैं।

  • लंबे समय तक टॉयलेट में बैठना
  • कम पानी पीना
  • लंबे समय तक बैठकर काम करना
  • गर्भावस्था के दौरान दबाव बढ़ना
  • मोटापा
  • अत्यधिक मसालेदार और तली-भुनी चीज़ें

बवासीर के शुरुआती लक्षण

बवासीर के शुरुआत में लक्षण हल्के होते हैं, लेकिन समय के साथ बढ़ सकते हैं। कुछ सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं।

  • शौच के समय या बाद में तेज दर्द
  • गुदा क्षेत्र में जलन या खुजली
  • टॉयलेट के बाद लाल खून आना
  • गुदा के आसपास सूजन या गांठ जैसा महसूस होना
  • बार-बार शौच की इच्छा लेकिन पूरी तरह पेट साफ़ न होने का एहसास

बवासीर के प्रकार

  • बवासीर दो प्रकार का होता है। जिसे हम इसके नाम के अनुसार सीधे समझ सकते हैं।
  • आंतरिक बवासीर – यह अंदर होती है। इसमें दर्द कम होता है लेकिन खून आ सकता है।
  • बाहरी बवासीर – यह बाहर दिखाई देती है। इसमें दर्द, सूजन और जलन ज़्यादा होती है।

बवासीर का इलाज क्या है?

बवासीर का उपचार संभव है, लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि हम लक्षण पहचान कर विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाएं। डॉक्टर आपके लक्षणों की पहचान कर सबसे पहले दर्द निवारक दवाएं और घरेलू उपाय अपनाने की सलाह देंगे। कुछ मामलों में रबर बैंड तकनीक, लेज़र इलाज या सर्जरी की आवश्यकता पड़ सकती है।

बवासीर के घरेलू उपाय क्या है?

बवासीर को ठीक करने के लिए कुछ घरेलू उपाय अपना जा सकते हैं जो इस प्रकार है।

  • रोज़ 8–10 गिलास पानी पिएँ
  • भोजन में हरी सब्ज़ियाँ, फल, सलाद शामिल करें
  • डॉक्टर की सलाह पर इसबगोल या फाइबर सप्लीमेंट लें
  • गुनगुने पानी में बैठकर स्नान करें
  • शौच को ज़्यादा देर तक न रोकें

बवासीर से बचाव के उपाय क्या ?

  • रोज़ हल्का शारीरिक व्यायाम करें
  • ज़्यादा देर तक लगातार बैठने से बचें
  • मसालेदार और जंक फूड कम करें
  • शौच के समय मोबाइल का उपयोग न करें
  • शरीर के संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें

शौच के समय दर्द, जलन या खून आना सामान्य बात नहीं है। यह बवासीर का शुरुआती संकेत हो सकता है, जिसे समय रहते पहचान लिया जाए तो बिना सर्जरी के भी नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसे में शर्म या डर छोड़कर सही समय पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

बार-बार चक्कर, मिचली और असंतुलन—ये शरीर आपको किस परेशानी के बारे में आगाह कर रहा है?

क्या आपको भी बार-बार चक्कर आना, उल्टी जैसा होना, चढ़ने-उतरने और चलने में संतुलन महसूस होता है? अगर ऐसा है, तो हो सकता है आपके शरीर में कहीं न कहीं कोई शारीरिक समस्या चल रही है; जो किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है। ऐसे में समस्या की पहचान कर इसका निदान बहुत जरूरी है। आज हम इस आर्टिकल में इसी को लेकर विस्तार से जानेंगे।

सामान्य तौर पर यह कान के अंदर की संतुलन की समस्या हो सकती है। इसके अलावा दिमाग और नसों की समस्या, बीपी, दिल और खून की कमी जैसी दिक्कतें भी इसका कारण हो सकती हैं। या शारीरिक कमजोरी के कारण भी ऐसा हो सकता है। ऐसे में इसे सिर्फ कमजोरी कहकर नजरअंदाज करना ठीक नहीं है। खासकर तब जब शिकायत बार-बार हो और आपके जीवन को प्रभावित कर रही हो।

बार-बार चक्कर, मिचली और असंतुलन क्यों होता है?

देखिए बार-बार चक्कर आना, मिचली और असंतुलन की समस्या के कई कारण हो सकते हैं। जिन्हें हम नीचे समझेंगे।

कान की अंदरूनी दिक्कत

  • हम सभी जानते हैं कि हमारे कान के भीतर संतुलन संभालने वाला एक सिस्टम होता है। अगर उसमें गड़बड़ हो जाए तो चक्कर आना, मिचली, चलने में असंतुलन महसूस हो सकता है।
  • इसके अलावा बी.पी.पी.वी. या कोई न्यूरो से संबंधित बीमारियों के कारण भी अचानक तेज चक्कर आना, मिचली और चलने फिरने में असंतुलन होने की समस्या देखने को मिलती है।

माइग्रेन और वेस्टीब्युलर माइग्रेन

कुछ लोगों में माइग्रेन के दौरे सिर्फ सिरदर्द से नहीं बल्कि चक्कर आने से, रोशनी, आवाज में परेशानी में, मिचली और अस्थिरता के रूप में भी सामने आते हैं। इसमें कई बार सरदर्द हल्का रहता है या होता ही नहीं है। लेकिन चक्कर आने पर उलझन की समस्या ज्यादा देखने को मिलती है।

बीपी, दिल की बीमारी या खून की कमी

अचानक बीपी का कम या ज्यादा हो जाना, दिल की धड़कन का अनियमित हो जाना, दिल की पंपिंग में कमी, खून की कमी या शरीर में पानी की कमी से भी चक्कर, कमजोरी, घबराहट और असंतुलन होता है। ऐसे में चलने-फिरने पर ज्यादा चक्कर महसूस होते हैं। साथ में थकान, सांस फूलने की भी समस्या रहती है।

दवाइयां और नशे के दुष्प्रभाव

कुछ दवाइयां जैसे मिर्गी, मानसिक रोग आदि की दवाइयां, शराब का सेवन की आदत से भी ऐसी समस्या देखने को मिलती है।

दिमाग और नसों की गंभीर बीमारियां

स्ट्रोक, मिनी स्ट्रोक और अन्य बीमारियों की स्थिति में भी चक्कर के साथ बोलने में लड़खड़ाहट, हाथ-पैर में कमजोरी, सुनने में कमी, चेहरा टेढ़ा होना, तेज सिर दर्द या बेहोशी जैसी समस्याएं देखने को मिलती है।

कब समझे कि मामला गंभीर हो सकता है?

ऐसी समस्या में यूं तो चक्कर, मिचली और असंतुलन के लक्षण दिखते हैं, लेकिन इसके साथ ही कुछ ऐसे संकेत भी सामने आते हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक होता है। ऐसी स्थिति में तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए।

  • अचानक बहुत तेज चक्कर आना, शरीर का संतुलन बिगड़ जाना और चल ही नहीं पाना।
  • बोलने में दिक्कत होना, शब्द साफ तरह से नहीं कह पाना, चेहरा टेढ़ा होना, हाथ पैर में कमजोरी या सुन्न हो जाना।
  • बहुत तेज अचानक सिर दर्द शुरू हो जाना, उलझन, बेहोशी रहना, छाती में दर्द होना और सांस का फूलना।
  • चक्कर के साथ आंखों से दोहरा दिखना या धुंधलापन

इस तरह के साथ में आने वाले लक्षण स्टॉक या दिल की गंभीर बीमारी की तरफ भी इशारा करते हैं। ऐसे में यह लक्षण भी दिखने पर डॉक्टर को तुरंत दिखाना चाहिए।

इलाज कैसे होता है? कौन सी जांच की जाती है?

जब रोगी को चक्कर आना, मिचली या अस्थिरता बार-बार हो रही हो तो डॉक्टर आमतौर पर निम्नलिखित बातों को देखते हैं।

सबसे पहले विशेषज्ञ डॉक्टर यह जानने का प्रयास करेंगे कि आपको समस्या कितने दिनों से परेशानी हो रही है, और चक्कर किस प्रकार का आता है यानी कि घूमने जैसा झूलने जैसा या हल्की सी धुंधलापन छा जाता है।

इसके अलावा डॉक्टर यह भी जानेंगे कि चक्कर कितनी देर रहता है? दिन में कितनी बार आता है? और किन परिस्थितियों में यह बढ़ जाता है?

किसके साथ ही मिचली, सुनने में कमी, सिर दर्द, दिल की धड़कन बढ़ना, सांस फूलना, कमजोरी की समस्या भी साथ में होती है या नहीं।

इन सब चीजों को देखने के बाद डॉक्टर शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल जांच करेंगे। कान में भी मशीन की सहायता से यह देखने का प्रयास किया जाता है कोई अंदरूनी चोट तो नहीं लगी हुई है।

इसके बाद रोगी की स्थिति, उसके बीमारी का इतिहास आदि का अवलोकन करने के बाद डॉक्टर खून की जांच करेगा या फिर अगर उन्हें लगता है तो एमआरआई / सीटी स्कैन भी करवाया जा सकता है।

इस समस्या का उपचार क्या है?

इस समस्या में उपचार को समझने के लिए हमें सबसे पहले यह बात समझनी होगी कि चक्कर आना कोई बीमारी नहीं है। दरअसल यह एक लक्षण है इसलिए इसका इलाज हमेशा इसके मूल कारण के आधार पर बदलता रहता है या किया जाता है।।

अगर अंदरूनी कान की समस्या है तो उसके लिए डॉक्टर सिर या आपके शरीर को खास तरह से घुमाकर कान में खिसके क्रिस्टल को सही जगह पर पहुंचाएंगे, जिससे कि यह समस्या दूर हो जाए।।

अगर समस्या बीपी, दिल की बीमारी या खून की कमी की है तो डॉक्टर दवाइयां, खान-पान में सुधार और अन्य सलाह देकर आपका उपचार करेंगे।

माइग्रेन और न्यूरोलॉजिकल कारण

माइग्रेन से जुड़े चक्कर में उसकी स्थिति की पहचान कर न्यूरोलॉजिस्ट कुछ नियमित दवाइयां भी देंगे। इसके अलावा आपको अन्य सावधानियां बरतने की भी सलाह देंगे।

दवाई और नशे के कारण

अगर समस्या किसी दवाई या शराब से जुड़ी हुई हो तो डॉक्टर दवा की खुराक बदल देंगे या आपको नशा छुड़ाने का भी मार्गदर्शन देंगे।

ऐसी समस्या में क्या सावधानियां रखें?

बार-बार चक्कर आने पर खुद ही दवा की शुरु करने के बजाय किसी के डॉक्टर को दिखाना जरूरी है।

जब तक चक्कर आ रहे हो वह नियंत्रित नहीं हो, तब तक अचानक उठने बैठने से बचे। बिस्तर से धीरे-धीरे उठे और सीढियां और बाथरूम इस्तेमाल करते समय किसी चीज का सहारा लें।

पर्याप्त मात्रा में पानी पिए, बहुत देर तक खाली पेट नहीं रहे, नींद भी पर्याप्त मात्रा में लें।

बार-बार चक्कर आना, मिचली या असंतुलन दरअसल शरीर की चेतावनी है। इसका अर्थ है कि कुछ तो शरीर में ठीक नहीं है। ऐसे में किसी विशेषज्ञ डॉक्टर को दिखाना बहुत जरूरी है।

यह आर्टिकल उपरोक्त समस्या को लेकर सामान्य जानकारी के लिए लिखा गया है। किसी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के लिए डॉक्टर को अवश्य दिखाएं।

गर्भावस्था में खून की कमी (Anemia) बच्चे के लिए खतरनाक हो सकती है: हीमोग्लोबिन बढ़ाने के उपाय

गर्भावस्था महिला के जीवन का सबसे नाज़ुक और महत्वपूर्ण समय होता है। इस दौरान मां के शरीर में होने वाला हर बदलाव गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ा होता है। लेकिन कई बार पोषण की कमी, जानकारी के अभाव या लापरवाही के कारण कुछ समस्याएं गंभीर रूप ले लेती हैं। इन्हीं में से एक आम लेकिन खतरनाक समस्या है गर्भावस्था में खून की कमी, जिसे एनीमिया कहा जाता है। बहुत सी महिलाएं इसे सामान्य कमजोरी मानकर अनदेखा कर देती हैं, जबकि यह मां और बच्चे दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकती है।

एनीमिया क्या होता है?

जब शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम हो जाता है, तो इस स्थिति को एनीमिया कहा जाता है। हीमोग्लोबिन खून का वह तत्व होता है जो शरीर के हर हिस्से तक ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता है। गर्भावस्था के दौरान मां के शरीर को अतिरिक्त खून और ऑक्सीजन की जरूरत होती है, क्योंकि उसी के जरिए बच्चे का विकास होता है। अगर इस समय हीमोग्लोबिन कम हो जाए, तो शरीर और गर्भ में पल रहे बच्चे तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती।

गर्भावस्था में खून की कमी के लक्षण?

गर्भावस्था में एनीमिया के लक्षण कई बार धीरे-धीरे सामने आते हैं और महिलाएं इन्हें सामान्य थकान समझकर नज़रअंदाज़ कर देती हैं। लेकिन अगर ये लक्षण लगातार बने रहें, तो इन्हें गंभीरता से लेना ज़रूरी है।

  • लगातार थकान और कमजोरी महसूस होना
  • थोड़ा चलने या काम करने पर सांस फूलना
  • चक्कर आना या सिर हल्का महसूस होना
  • दिल की धड़कन तेज़ होना
  • चेहरे, होंठों और नाखूनों का पीला पड़ना
  • सिरदर्द रहना
  • हाथ-पैर ठंडे लगना
  • सीढ़ियां चढ़ते समय अत्यधिक थकावट

गर्भावस्था में खून की कमी के कारण?

एनीमिया होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं और अक्सर एक से अधिक वजहें एक साथ काम करती हैं। गर्भावस्था में शरीर की जरूरतें बढ़ जाती हैं, लेकिन अगर पोषण सही न मिले तो खून की कमी हो जाती है।

  • आयरन की कमी
  • फोलिक एसिड और विटामिन बी12 की कमी
  • गर्भावस्था से पहले ही हीमोग्लोबिन कम होना
  • बार-बार उल्टी होना या खाना ठीक से न पचना
  • गलत खान-पान और पोषण की कमी
  • कम अंतराल में बार-बार गर्भधारण
  • चाय या कॉफी का अत्यधिक सेवन
  • आयरन की दवाइयों को नियमित न लेना
  • किसी पुरानी बीमारी या संक्रमण की वजह से

एनीमिया बच्चे के लिए क्यों खतरनाक हो सकता है?

गर्भावस्था में खून की कमी का असर केवल मां तक सीमित नहीं रहता। जब मां के शरीर में ऑक्सीजन की कमी होती है, तो बच्चे तक भी पूरी मात्रा में ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इससे बच्चे का वजन कम रह सकता है, समय से पहले डिलीवरी का खतरा बढ़ सकता है और बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। गंभीर मामलों में यह स्थिति नवजात के स्वास्थ्य के लिए भी जोखिम पैदा कर सकती है।

गर्भावस्था में हीमोग्लोबिन बढ़ाने के उपाय

गर्भावस्था में एनीमिया को समय रहते कंट्रोल किया जा सकता है, बशर्ते सही खान-पान और डॉक्टर की सलाह का पालन किया जाए। हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए जीवनशैली और आहार दोनों पर ध्यान देना ज़रूरी होता है।

  • हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे पालक, मेथी और सरसों का सेवन करना
  • चुकंदर, अनार, सेब, खजूर और किशमिश को आहार में शामिल करना
  • दालें, चना, राजमा और सोयाबीन का नियमित सेवन
  • सीमित मात्रा में गुड़ का उपयोग
  • विटामिन C से भरपूर फल जैसे नींबू, आंवला और संतरा खाना
  • डॉक्टर द्वारा दी गई आयरन और फोलिक एसिड की दवाइयों को नियमित लेना
  • चाय और कॉफी का सेवन कम करना
  • पर्याप्त आराम और नींद लेना
  • समय-समय पर ब्लड जांच कराना

नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह क्यों ज़रूरी है?

गर्भावस्था के दौरान नियमित ब्लड टेस्ट बहुत जरूरी होते हैं। इससे समय रहते हीमोग्लोबिन की कमी का पता चल जाता है और गंभीर स्थिति बनने से पहले ही इलाज शुरू किया जा सकता है। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाइयां बंद करना या बदलना नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए इलाज को लेकर लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए।

गर्भावस्था में खून की कमी एक आम लेकिन गंभीर समस्या है, जिसे नजरअंदाज़ करना मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है। सही समय पर पहचान, संतुलित आहार, नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह से एनीमिया को नियंत्रित किया जा सकता है। गर्भावस्था के दौरान महिला को अपने शरीर के संकेतों को समझना चाहिए और किसी भी असामान्य लक्षण को हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि मां का स्वास्थ्य ही बच्चे के सुरक्षित भविष्य की नींव होता है।

PCOD/PCOS क्या है? अनियमित पीरियड्स (Irregular Periods) को ठीक करने के उपाय

आज के समय में महिलाओं से जुड़ी कई ऐसी स्वास्थ्य समस्याएँ हैं, जिनके बारे में पहले खुलकर बात नहीं की जाती थी। लेकिन अब जागरूकता बढ़ने के साथ महिलाएँ अपने शरीर को बेहतर समझने लगी हैं। इन्हीं समस्याओं में से एक है PCOD और PCOS, जो खासतौर पर पीरियड्स की अनियमितता से जुड़ी होती है। बहुत सी लड़कियाँ और महिलाएँ यह समझ नहीं पातीं कि उनके पीरियड्स समय पर क्यों नहीं आते, कभी बहुत देर से आते हैं या कई महीनों तक नहीं आते। ऐसे में सही जानकारी होना बेहद ज़रूरी है। आगे जानिए PCOD/PCOS क्या है :

PCOD और PCOS क्या होता है?

PCOD और PCOS दोनों ही महिलाओं के हार्मोन से जुड़ी समस्याएँ हैं। PCOD का मतलब होता है Polycystic Ovarian Disease और PCOS का मतलब होता है Polycystic Ovary Syndrome। इन दोनों स्थितियों में अंडाशय यानी ओवरी में छोटे-छोटे सिस्ट बनने लगते हैं, जिससे हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है।

सरल शब्दों में कहें तो जब शरीर में हार्मोन सही तरीके से काम नहीं करते, तो ओव्यूलेशन ठीक से नहीं हो पाता और इसका सीधा असर पीरियड्स पर पड़ता है।

PCOD और PCOS क्यों होता है?

इस समस्या के पीछे कोई एक वजह नहीं होती। कई बार यह जीवनशैली से जुड़ी होती है और कई बार शरीर के अंदर चल रहे हार्मोनल बदलावों से। आजकल तनाव, अनियमित खान-पान, जंक फूड, नींद की कमी और शारीरिक गतिविधि की कमी इसके बड़े कारण माने जाते हैं।

इसके अलावा अगर परिवार में किसी महिला को PCOD या PCOS की समस्या रही हो, तो अगली पीढ़ी में इसका खतरा बढ़ सकता है। मोटापा, इंसुलिन रेजिस्टेंस और थायरॉयड जैसी समस्याएँ भी इसे बढ़ावा देती हैं।

PCOD/PCOS के लक्षण क्या है?

PCOD और PCOS के लक्षण हर महिला में अलग-अलग हो सकते हैं। सबसे आम लक्षण अनियमित पीरियड्स हैं। किसी को महीनों तक पीरियड्स नहीं आते, तो किसी को बहुत कम गैप में या बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग होती है।

इसके अलावा चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल बढ़ना, मुंहासे, बालों का झड़ना, वजन तेजी से बढ़ना, थकान महसूस होना और मूड स्विंग्स भी इसके आम लक्षण हैं। कई महिलाओं को गर्भधारण में भी परेशानी होती है, जो उन्हें मानसिक रूप से परेशान कर सकती है।

अनियमित पीरियड्स क्यों होते हैं?

PCOD और PCOS में हार्मोन का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे ओव्यूलेशन सही समय पर नहीं होता। जब ओव्यूलेशन नहीं होता, तो पीरियड्स भी समय पर नहीं आते।
इसके अलावा तनाव, अचानक वजन बढ़ना या घटना, गलत खान-पान और नींद की कमी भी पीरियड्स को अनियमित कर सकती है। कई बार महिलाएँ इसे सामान्य समझकर नज़रअंदाज़ कर देती हैं, जबकि यह शरीर का संकेत होता है कि कुछ गड़बड़ चल रही है।

PCOD/PCOS में क्या सावधानियाँ ज़रूरी हैं?

इस समस्या को कंट्रोल करने के लिए सबसे ज़रूरी है जीवनशैली में सुधार। नियमित दिनचर्या अपनाना, समय पर खाना और पर्याप्त नींद लेना बहुत मददगार साबित होता है। लंबे समय तक बैठकर काम करने से बचना और रोज़ थोड़ा-बहुत चलना या व्यायाम करना भी फायदेमंद होता है।
तनाव को कम करना भी बेहद ज़रूरी है, क्योंकि मानसिक तनाव सीधे हार्मोन को प्रभावित करता है।

अनियमित पीरियड्स को ठीक करने के उपाय?

PCOD और PCOS में पीरियड्स को नियमित करने के लिए सबसे पहले खान-पान पर ध्यान देना ज़रूरी है। ज्यादा तला-भुना, मीठा और प्रोसेस्ड फूड कम करना चाहिए। हरी सब्ज़ियाँ, फल, दालें और फाइबर से भरपूर आहार को अपनी डाइट में शामिल करना लाभकारी होता है।

नियमित व्यायाम जैसे तेज़ चलना, योग या हल्की एक्सरसाइज़ हार्मोन बैलेंस करने में मदद करती है। वजन कंट्रोल में आने से कई महिलाओं के पीरियड्स अपने आप नियमित हो जाते हैं।

डॉक्टरी की सलाह कब लें?

अगर जीवनशैली में सुधार के बाद भी समस्या बनी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी होता है। डॉक्टर जांच के बाद दवाइयाँ या हार्मोनल ट्रीटमेंट सुझा सकते हैं, जो पीरियड्स को नियमित करने में मदद करता है। बिना सलाह के दवाइयाँ लेना नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए खुद से इलाज करने से बचना चाहिए।

क्या PCOD/PCOS पूरी तरह ठीक हो सकता है?

यह सवाल लगभग हर महिला के मन में होता है। PCOD और PCOS को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन सही जीवनशैली, नियमित देखभाल और डॉक्टर की सलाह से इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। कई महिलाएँ सही मैनेजमेंट से पूरी तरह सामान्य जीवन जीती हैं और उनके पीरियड्स भी नियमित रहते हैं।

PCOD और PCOS कोई ऐसी बीमारी नहीं है जिससे घबराने की ज़रूरत हो, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ करना भी सही नहीं है। अनियमित पीरियड्स शरीर का संकेत होते हैं कि उसे ध्यान और देखभाल की ज़रूरत है। सही जानकारी, संतुलित जीवनशैली और समय पर इलाज से इस समस्या को काबू में रखा जा सकता है। सबसे ज़रूरी बात यह है कि महिलाएँ अपने शरीर की बात सुनें और ज़रूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से सलाह लेने में हिचकिचाएँ नहीं।

उठते-लेटते समय चक्कर आना: क्या यह BPPV है या कोई और कारण?

अक्सर आपने लोगों को यह कहते हुए सुना होगा कि जैसे ही बिस्तर पर लेटता हूँ तो कमरा घूमने लगता है या फिर अचानक सिर घुमाने पर ऐसा लगता है जैसे आसपास सब गोल‑गोल घूम रहा हो, और यह अपने आप थोड़ी देर में खुद ही ठीक हो जाता है।

ऐसा होने पर ज़्यादातर लोग घबरा जाते हैं, और सोचते हैं कि हमारा बीपी लो हो गया है, कोई कोई इस कमजोरी भी बताता है लेकिन हर बार ऐसा ही हो, जरूरी नहीं है। असल में, कई बार इसका कारण हमारे अंदरूनी कान की एक समस्या हो सकती है, जिसे बी.पी.पी.वी. कहा जाता है। हालांकि हर बार आने वाला चक्कर बी.पी.पी.वी. ही हो, यह भी ज़रूरी नहीं है।

बी.पी.पी.वी. क्या होता है?

हमारे कान के भीतर बहुत ही नाज़ुक संतुलन तंत्र होता है, जो यह महसूस करता है कि हमारा सिर किस दिशा में है, हम सीधे खड़े हैं या झुके हुए हैं। इसी के जरिए अपने दिमाग़ को पता चलता है कि शरीर का बैलेंस कैसे बनाकर रखना है। इस तंत्र में बहुत छोटे‑छोटे कैल्शियम जैसे क्रिस्टल होते हैं, जो कभी‑कभी अपनी मूल जगह से हटकर पास की नलिकाओं में चले जाते हैं।

जब ऐसा होता है, और इसी दौरान हम जब सिर की पोज़िशन अचानक बदलते हैं, तो ये क्रिस्टल उस नलिका के अंदर हिलते हैं और दिमाग़ को गलत सिग्नल पहुंचाते है। जिसकी वजह से हमें अचानक तेज़ घूमने जैसा या चक्कर आना महसूस होता है, और कुछ सेकंड बाद जब क्रिस्टल शांत हो जाते हैं, तो चक्कर भी अपने‑आप कम हो जाता है। यही स्थिति बी.पी.पी.वी. कहलाती है।

बी.पी.पी.वी. के सामान्य लक्षण

अगर किसी को बी.पी.पी.वी. है, तो सामान्य रूप से चक्कर की एक खास अलग पैटर्न देखने को मिलती है, जो इस प्रकार हैं।

-जब भी हम बिस्तर पर लेटते हैं, उठते हैं या करवट बदलते हैं, तो अचानक कुछ सेकंड के लिए तेज़ घूमने जैसा चक्कर महसूस होता है।
– कभी‑कभी झुककर कुछ उठाने, सिर ऊपर करके पंखा या ट्यूब लाइट देखने, या फिर अचानक सिर एक तरफ़ मोड़ने पर भी इसी तरह का महसूस होता है।
– इस समस्या में चक्कर थोड़ा समय के लिए रहता है, और फिर अपने‑आप कम हो जाता है, लेकिन दिन में कई बार चक्कर आना महसूस हो सकता है।
– इसके अलावा चक्कर के साथ में उल्टी, घबराहट या असंतुलन महसूस हो सकता है, जैसे चलने पर लगता है कि ज़मीन घूम रही है।

आम तौर पर ऐसा होने पर कान में तेज़ दर्द, कान में बजना, अचानक सुनने की क्षमता कम होना या फिर चेहरा और हाथ‑पैर सुन्न पड़ने जैसी शिकायतें देखने को नहीं मिलती है। लेकिन अगर ऐसे लक्षण भी में साथ हों, तो दूसरी गंभीर वजहें भी हो सकती हैं।

क्या हर पोज़िशन पर आने वाला चक्कर बी.पी.पी.वी. होता है?

नहीं, ऐसा ज़रूरी नहीं है। सिर घुमाने या पोज़िशन बदलने पर आने वाले चक्कर की दूसरी वजहें भी हो सकती हैं।

कभी‑कभी कान के अंदर सूजन या संक्रमण होने से भी चक्कर आना, कान में भारीपन के साथ चलने में असंतुलन महसूस हो सकता है। कुछ लोगों में मेनिएर नाम की बीमारी में भी चक्कर के साथ कान में भारीपन लगना, सीटी या भनभनाहट की आवाज़ और सुनने में कमी की समस्या देखने को मिलती है।

इसके अलावा माइग्रेन से ग्रसित लोगों को भी ऐसे चक्कर आते हैं, जिनमें रोशनी, आवाज़ या कुछ खास खाने‑पीने की चीज़ें प्रभावित करती हैं। कुछ दवाइयों के साइड इफेक्ट से भी ऐसा हो सकता है।

बी.पी.पी.वी. होने के कारण क्या हैं?

कई बार बी.पी.पी.वी. बिना किसी ख़ास कारण के भी हो जाता है। यह समस्या खासकर मिडल एज और बुज़ुर्गों में देखने को मिलती है। लेकिन इसके अलावा भी कुछ कारण हैं, जिससे भी बी.पी.पी.वी. हो सकता है।

– अगर सिर पर चोट लगी हो, या पहले कभी एक्सीडेंट हुआ हो और उस समय दिमाग़ को झटका पहुँचा हो, तो अंदरूनी कान के क्रिस्टल ढीले हो सकते हैं।

– जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक एक ही स्थिति (पोजिशन) में लेटा रहा हो, जैसे बड़ी सर्जरी के बाद तब भी ऐसा होने की संभावना रहती है।

– उम्र बढ़ने के साथ ये कण ज़्यादा नाज़ुक हो जाते हैं, और उनके अपनी जगह से खिसकने की संभावना बढ़ जाती है, इसलिए बुज़ुर्गों में बी.पी.पी.वी. होने की संभावना ज्यादा रहती है।

– कुछ न्यूरोलॉजिकल बीमारियों या पहले से चल रही संतुलन संबंधी दिक़्कतों से ऐसा हो सकता है।

डॉक्टर के पास कब जाना ज़रूरी है?

अगर चक्कर सामान्य हैं, कभी‑कभार आते हैं और खुद ही कुछ सेकंड में समाप्त हो जाते हैं, तो इसे सामान्य मान सकते हैं। लेकिन जब निम्नलिखित लक्षण भी साथ में देखने को मिले तो, डॉक्टर को अवश्य दिखाएं।

– यदि चक्कर रोज़ आते हों, दिन में कई बार आते हों या कई दिनों से ऐसा हो रहा हो।
– चक्कर के साथ बोलने में दिक़्कत, चेहरा टेढ़ा लगना, हाथ‑पैर में कमज़ोरी या सुन्नपन, डबल दिखना, बहुत तेज़ सिरदर्द या बेहोशी जैसा महसूस हो।
– जब कान से पानी या खून आए, सुनाई देना अचानक बहुत कम हो जाए या कान में बहुत ज़्यादा दर्द हो।

ऐसी स्थिति में खुद इलाज करने की बजाय तुरंत ईएनटी विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिए।

बी.पी.पी.वी. का इलाज क्या है?

बी.पी.पी.वी. को लेकर अच्छी बात यह है कि अधिकतर मामलों में यह दवाइयों के बजाय कुछ ख़ास तरह की एक्टिविटीज से ठीक किया जा सकता है। इन एक्टिविटीज को “रीपोज़िशनिंग मैन्युवर” कहा जाता है।

इसमें सबसे पॉपुलर एप्ली मैन्युवर है। इसमें डॉक्टर या विशेषज्ञ फिज़ियोथेरेपिस्ट आपको एक विशेष क्रम में लिटाते, सिर घुमाते और बैठाते हैं, ताकि जो क्रिस्टल गलत नलिका में चले गए हैं, वे फिसलकर वापस उस जगह चले जाएं। जिससे कि दिमाग़ को गलत सिग्नल न भेज सके।

जिन लोगों को लंबे समय से चक्कर की समस्या हो, उसे ठीक करने के लिए कुछ खास एक्सरसाइज़ और वेस्टिब्युलर रीहैबिलिटेशन प्रोग्राम भी कराए जाते हैं। इससे शरीर और दिमाग़ दोनों की स्थिति सही होती है और रोज़मर्रा के काम करने में आत्मविश्वास बढ़ता है।

इसके अलावा बी.पी.पी.वी. में डॉक्टर दवाइयां भी देते हैं लेकिन यह दवाइयां इस समस्या के मूल कारण को ठीक नहीं कर पाती हैं, इसलिए एक्टिविटीज और एक्सरसाइज करवाई जाती है जिससे कि आराम मिल सके।

क्या आपकी गर्दन कभी-कभी अपने-आप कांपने लगती है? यह कौन-सी समस्या है?

आजकल की भागदौड़ और व्यस्त भरी ज़िंदगी में गर्दन का दर्द, अकड़न और भारीपन आम बात हो गई है, लेकिन कई लोगों को एक अलग तरह की परेशानी का भी सामना करना पड़ता है, और वह है गर्दन या सिर का अपने-आप हिलना या कांपना।

इस परेशानी में कभी सिर हां या ना की तरह हल्का-हल्का हिलता है, तो कभी गर्दन में झटके भी महसूस होते हैं, और व्यक्ति खुद भी समझ नहीं पाता कि यह कमजोरी है, कोई नस की समस्या है या फिर सिर की कोई बड़ी बीमारी।

इस तरह के गर्दन के कांपने को सामान्य भाषा में गर्दन कांपना कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन मेडिकल की भाषा में इसे ट्रेमर या कुछ मामलों में सर्वाइकल डिस्टोनिया जैसे मूवमेंट डिसऑर्डर से भी जोड़ा जाता है।

इस आर्टिकल में हम इसी समस्या को लेकर विस्तार से जानेंगे।

गर्दन कांपने की समस्या क्या है?

सामान्य अर्थ में इसे समझे तो गर्दन कांपने की समस्या में गर्दन की मांसपेशियाँ बिना आपकी इच्छा के बार-बार सिकुड़ती और ढीली होती हैं, जिससे सिर या गर्दन में हल्का या तेज़ कंपन, झटके या घुमाव जैसा महसूस होता है। कई लोगों में यह समस्या कभी-कभार केवल कुछ सेकंड के लिए होती है, जबकि कुछ लोगों में लगातार या दिन में बार-बार ऐसा होता रहता है और रोज़मर्रा के कामों पर का विपरीत प्रभाव पड़ता है।

कई बार यह समस्या शरीर के किसी मूवमेंट डिसऑर्डर का हिस्सा होती है। जिसमें हाथ, सिर, आवाज़ या शरीर के दूसरे हिस्से में भी कांपने की समस्या देखने को मिलती हैं। इस समस्या में कुछ लोगों में केवल सिर-गर्दन ही कांपते हैं, जिसे हेड ट्रेमर या सर्वाइकल डिस्टोनिया से जुड़े ट्रेमर के रूप में भी देखा जाता है।

गर्दन कांपने के मुख्य कारण

गर्दन कांपने के कई कारण हो सकते हैं, जो कि हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ प्रमुख कारणों को ऐसे समझा जा सकता है।

  1. एसेंशियल ट्रेमर: यह एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है जिसमें शरीर के किसी हिस्से में बार-बार कंपन होता है। इसमें आमतौर पर हाथ, सिर या आवाज़ पर असर देखने को मिलता है। शारीरिक गतिविधि पर कंपन ज़्यादा महसूस होता है।
  2. सर्वाइकल डिस्टोनिया (स्पास्मोडिक टॉर्टिकॉलिस): इसमें गर्दन की मांसपेशियाँ बहुत ज्यादा सिकुड़ जाती हैं, जिससे सिर एक तरफ़ मुड़ने, टेढ़ा होने है या अजीब स्थिति में जाने का खतरा रहता है। इसमें झटके के साथ कंपन्न महसूस हो सकता है।
  3. रीढ़/सर्वाइकल स्पाइन की समस्या: इसके अंतर्गत गर्दन की हड्डियों, नसों या स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव की वजह से भी हाथ-पैर के साथ-साथ कभी-कभी गर्दन या सिर में कंपन या झटके महसूस होने की संभावना रहती हैं।
  4. दवाइयों का दुष्प्रभाव: कुछ मनोरोग से जुड़ी दवाएँ, थायरॉयड की दवाएँ, या कुछ अन्य दवाइयाँ शरीर में कंपन जैसे साइड इफेक्ट डाल सकती हैं, जिससे भी यह समस्या देखने को मिलती है।
  5. हार्मोन और मेटाबॉलिक गड़बड़ी: इसमें थायरॉयड का ज़्यादा एक्टिव होना, लीवर या किडनी की गंभीर बीमारी, ब्लड शुगर की गड़बड़ी आदि समस्याएं भी कई बार इसे बढ़ा सकते हैं।
  6. नशा, कैफीन और अल्कोहल का सेवन: बहुत ज़्यादा चाय-कॉफ़ी पीना, शराब का ज़्यादा सेवन या अचानक शराब छोड़ देने से भी कंपन हो सकता है या पहले से चल रही इस समस्या को बढ़ा सकता है।
  7. तनाव और थकान: मानसिक तनाव, घबराहट, पर्याप्त नींद की कमी और शारीरिक थकान से भी कंपन हो सकता है या बढ़ सकता है।

गर्दन कांपने के लक्षण कैसे पहचानें?

हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आम तौर पर कुछ संकेत अक्सर दिखाई देते हैं, जो इस प्रकार हैं।

  • सिर का हां या ना के जवाब के संकेत जैसा हिलना, या कोई काम करते समय ज़्यादा दिख सकता है।
  • गर्दन का एक दिशा में मुड़ जाना या टेढ़ा रहना। साथ में दर्द, जकड़न और झटकेदार कंपन महसूस होना।
  • सिर को सीधा रखने में समस्या होना। आईने में देखने पर गर्दन का अक्सर टेढ़ा दिखना।
  • तनाव, घबराहट, तेज रोशनी, भीड़ या किसी मंच पर बोलते और परफॉर्मेंस देते समय गर्दन या सिर का कंपन बढ़ जाना।
  • कंपन के साथ-साथ गर्दन में दर्द, खिंचाव, कंधों में जकड़न, सिरदर्द या कभी-कभार चक्कर जैसा महसूस होना।

इस समस्या में कुछ लोगों में केवल गर्दन ही नहीं, बल्कि हाथ और शरीर के अन्य हिस्से भी साथ-साथ कांपने की समस्या देखने को मिलती है। जिससे लिखने, खाने, बोलने या कप पकड़ने जैसे सामान्य कामों में भी दिक़्क़त होती हैं।

डॉक्टर के पास कब ज़रूर जाएँ?

  • कंपन बार-बार हो रहा हो या कई हफ़्तों से लगातार चल रहा हो।
  • गर्दन के साथ-साथ हाथ-पैर भी कांपने लगें या फिर चलने-फिरने में बैलेंस नहीं बनें।
  • गर्दन टेढ़ी हो जाए, बहुत ज्यादा दर्द हो, या अचानक गंभीर जकड़न के साथ बुखार या कमज़ोरी आए।
  • बोलने, निगलने, दिखने या बैलेंस बनाने में समस्या देखने को मिले।

उपचार क्या है?

गर्दन के कंपन का उपचार इसके कारण पर निर्भर करता है। इसमें हर व्यक्ति के लिए दवा और परामर्श अलग हो सकता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह बहुत ज़रूरी है। सामान्य रूप से जो प्रमुख विकल्प उपयोग में लिए जाते हैं, उन्हें सरल भाषा में ऐसे समझ सकते हैं।

1. दवाइयाँ

कुछ विशेष दवाएँ एसेंशियल ट्रेमर में कंपन कम करने के लिए दी जा सकती हैं। यह दवाई एक्सपर्ट की सलाह पर ही लेनी चाहिए। डॉक्टर आपकी समस्या और कारणों को समझकर उसके अनुसार दवाई देंगे।

2. बोटुलिनम टॉक्सिन (बोटॉक्स) इंजेक्शन

बोटुलिनम टॉक्सिन नामक इंजेक्शन एक्सपर्ट डॉक्टर के द्वारा गर्दन की फिक्स जकड़ी हुई मांसपेशियों में बहुत कम मात्रा में लगाते हैं, जिससे वे मांसपेशियाँ कुछ महीनों के लिए ढीली पड़ जाती हैं और कंपन या टेढ़ापन कम हो जाता है।

3. फिज़ियोथेरेपी और व्यायाम

सामान्य स्ट्रेचिंग व्यायाम, गर्दन और कंधों की मांसपेशियों को मज़बूत करने वाले अभ्यास आदि दर्द और खिंचाव में काफ़ी राहत मिल सकती है।

4. सर्जरी (केवल चुनिंदा या गंभीर मामलों में)

जब दवाइयाँ और इंजेक्शन से भी राहत नहीं मिले और कंपन बहुत ज्यादा हो, ऐसी स्थिति में डीप ब्रेन स्टिम्यूलेशन (DBS) नामक सर्जरी की जाती है। इसमें मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में बेहद पतले इलेक्ट्रोड लगाए जाते हैं, जिससे असामान्य कंपन पैदा करने वाले सिग्नल नियंत्रित किए जा सकें। यह जटिल और महंगी प्रक्रिया है।

5. जीवनशैली में सुधार

हम अपने जीवन शैली में सुधार करके भी समस्या से राहत प्राप्त कर सकते हैं। इसके तहत चाय कॉफी और कैफीन का सेवन कम करना। शराब से सावधानी, पर्याप्त नींद और तनाव नहीं लेना आदि।

क्या यह हमेशा गंभीर बीमारी है?

हर गर्दन कांपना गंभीर बीमारी नहीं होता है। कभी कभार हल्की थकान, तनाव या कैफीन से भी कुछ देर हल्का कंपन हो सकता है जो आराम और जीवनशैली सुधार से ही ठीक हो जाता है।

लेकिन यदि यह समस्या बार-बार, लगातार या बढ़ती जाए, और इसके साथ दर्द, गर्दन टेढ़ी होना, चलने-फिरने में दिक़्क़त, बोलने-निगलने में समस्या जैसे लक्षण भी दिखे तो इसे नज़र अंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे मामलों में तुरंत डॉक्टर से संपर्क कर इसका उचित उपचार कराना चाहिए।

यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी तरह के गर्दन कांपने, सिर हिलने या न्यूरोलॉजिकल समस्या के लिए स्वयं इलाज करने के बजाय विशेषज्ञ चिकित्सक से जाँच और सलाह लेना आवश्यक है।

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आज के समय में लोग अलग‑अलग तरह की बीमारियों और स्वास्थ्य समस्याओं से परेशान रहते हैं। इनमें कुछ समस्याएं तो ऐसी होती हैं, जिन्हें वह चिकित्सक या अन्य के समक्ष बताने से नहीं कतराते हैं लेकिन कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं, जिन्हें बताने में शर्मिंदगी महसूस होती है।

ऐसी ही एक शर्मिंदगी देने वाली समस्या है शरीर से जरूरत से ज्यादा पसीना आना, जिसे मेडिकल भाषा में हाइपरहाइड्रोसिस कहा जाता है। यह स्थिति भले ही जानलेवा और गंभीर नहीं हो, लेकिन यह व्यक्ति के आत्मविश्वास, सामाजिक जीवन और रोज़मर्रा की गतिविधियों को प्रभावित करती है।

इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि हाइपरहाइड्रोसिस क्या है, यह क्यों होता है, इसके लक्षण क्या हैं और इसका इलाज कैसे किया जाता है।

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